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क्या भारत एक मजबूत एशियन ASEAN का नेतृत्व कर पायेगा ?

Published on November 21 2018 05:11 pm  |  Author: अबुवहाब चौधरी

कुछ ही दिन पहले दक्षिण पूर्वी देशो के गुट एशियन (ASEAN) का सिंगापूर में शिखर सम्मलेन हुआ। दक्षिणी पूर्वी देशो और पुरे हिन्द प्रशांत पर चीन का एक गहरा प्रभाव पड़ रहा है, जो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनोती है। ASEAN यानि दक्षिण पूर्वी देश भारत को इस चीन की बढती शक्ति के सामने संतुलन बनाये रखने में सक्षम समझते है। साथ ही पुर क्षेत्रों में आर्थिक मजबूती तथा एक स्वतंत्र इंडो-पेसिफिक क्षेत्र बनाने में सबकी भारत के ऊपर नज़र है। हालाकि भारत एक इंडो-पेसिफिक क्षेत्र बनाकर चीन को नाखुश नहीं करना चाहता है। फिर भी भारत ASEAN देशो जैसे – वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मयंमार और मलेसिया से अपने संबंध मजबूत कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने सिंगापूर में ASEAN के दौरान निवेश कारोबार और अच्छे सम्बन्ध बनाने पर फोकस किया। चीन ने भारत के साथ मिल कर वन बेल्ट वन रोड (OBOR) परियोजना की बात की। लेकिन भारत OBOR को मंज़ूरी नहीं देना चाहता है। इसका कारण यह होगा की OBOR के जरिये छोटे देशो पर अपना कब्ज़ा जमाना।

पूरे इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में एक सामरिक भूस्खलन चल रहा है। जहाँ चीन का उदय और OBOR परियोजना चीन का एक अहम हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट से भारत की अहमियत राजनितिक दृष्टि से बढ़ रही है। अमेरिका के लिए भी इंडो-पेसिफिक मायने रखता है ताकि चीन की मजबूती को कम कर सके।

भारत का पडोसी देश मालदीव हाल ही में चीन के समर्थक अब्दुल्ला यामिन के चंगुल से छुटा है। यामिन ने भारत के कई प्रोजेक्ट को साइड में कर दिया था। जैसे मालदीव सेना के लिए भारत की ट्रेनिंग अकादमी और भारत की प्राइवेट कंपनी वहां लगाने पर रोक व और भी कई अन्य मामले है। नए राष्ट्रपति ने आते ही साफ़ किया की वह पुरानी सरकार के कामो की जांच करेगा और जो पिछली सरकार ने चीन से क़र्ज़ लिया उससे सरकार के खजाने खाली हुए है। पिछली सरकार ने जो चीन को प्रोजेक्ट दिए उनकी जांच की मांग चल रही है। नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी जी का होना इस बात का संकेत है की अब मालदीव भारत की तरफ रहेगा।

इधर श्रीलंका के राजनितिक संकट भी भारत और चीन के बीच टकराव की स्तिथि पैदा कर सकते है। भारत हमेशा से ही श्रीलंका का सहयोगी रहा है। कोलम्बो चीन के नए सिल्क-रोड़ परियोजना का हिस्सा होने वाला है जिससे राजपक्षे पर आरोप है कि उसने चीन से रिश्वत लेकर परियोजनाओ को बांटा है।

आज ASEAN की सबसे बड़ी प्रॉब्लम दक्षिण चीन सागर है। इसका कारण यह है की चीन ने बिजिंग के बांटो और राज करो निति पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। साउथ ईस्ट एशिया 640 मिलियन लोगो की आबादी वाला क्षेत्र है। अगर यहाँ चीन का दबदबा हो गया तो इसका असर पूरे इंडो-पेसिफिक क्षेत्र पर पड़ेगा। ASEAN की दूसरी बड़ी चिंता यह भी है कि दक्षिण पूर्वी देशो की इकॉनोमी में लगातार फांसला बढ़ता जा रहा है।

इस क्षेत्र में चीन की बढती शक्ति को रोकने के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका ने मिलकर एक कुओड बनाया है। हालाकि भारत ने यह भी साफ़ कर दिया की उसके समुद्री सम्बन्ध अमेरिका और उसके सम्बन्ध वाले देशो से ही नहीं बल्कि वह चीन से भी सम्बन्ध रखना चाहता है तथा रूस को भी इस मामले पर भारत नाराज़ नहीं करना चाहता है। क्योकि ये भारत के हित में है। चीन अपनी परियोजाओ में कई बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है जहाँ ये परियोजनाए जा रही है वहां नौकरी और विकास का वादा किया जा रहा है।

अब ट्रम्प प्रशासन ने चीन के खिलाफ अपनी 1970 वाली निति को बदल दिया है। ट्रम्प सरकार ने चीन को सहयोग देने के बजाय उसके खिलाफ स्पर्धा का रुख अपनाया है, जिससे ट्रेड वॉर बढेगा। अब भारत के लिए मौका है कि वह श्रीलंका में राजपक्षे व मालदीव में अब्दुल्लाह जो चीन के कट्टर समर्थक थे उनके पतन के बाद किस तरह श्रीलंका व मालदीव जैसे देशो को चीन के चंगुल से बाहर निकालेगा। ये छोटे देश जो भारत की तरफ उम्मीदों की किरण से देख रहे है।

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About अबुवहाब चौधरी
अबुवहाब चौधरी मुम्बई के रहवासी और इंडिया-पॉलिटिक्स में बतौर फ्रीलांसर कार्यरत है। ये एक समाचार एवं फिल्म लेखक है। वहाब पत्रकारिता में किसी किस्म का पक्षपात नहीं करते एवं ताज़ा खबरों की तलाश में रहते है। Email- abuwahabchaudhary@gmail.com

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