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वरुण के हितो की ज़िम्मेदारी सोनिया व राजीव की होगी : इंदिरा गाँधी की वसीयत मे साफ लिखा था

Published on November 19 2018 12:41 pm  |  Author: अबुवहाब चौधरी

इंदिरा गाँधी के वसीयतनामे से लगभग यह तय सा ही हो रहा था कि इंदिरा ने राजीव और उनके बेटे राहुल को ही राजनीति का उत्तराधिकार माना था न कि वरुण गाँधी को... इंदिरा गाँधी ने 4 मई 1981 को एक वसीयत लिखी। जिसके गवाह एम.वी राजन व माखन लाल थे। इस वसीयत में लिखा गया कि मैं यह देखकर खुश हूँ कि राजीव और सोनिया वरुण को उतना ही प्यार करते है जितना कि राहुल व प्रियंका को। मुझे पूरा यकीन है कि जहाँ तक होगा ये दोनों वरुण के हितो की रक्षा करेंगे। इंदिरा ने आगे लिखा कि “संजय की जायदाद में जितना भी मेरा शेयर है वो वरुण को मिले। इन बच्चो के बालिग़ होने तक यह संपत्ति ट्रस्ट के पास रहेगी जिसके प्रबंधक राजीव व सोनिया रहेंगे।" इंदिरा गाँधी ने अपनी वसीयत में हर किसी का जिक्र किया सिवाए अपने छोटे पुत्र की विधवा मेनका गाँधी के, क्योकि संजय की मौत के बाद इंदिरा और मेनका गाँधी के रिश्तो में दरार पड़ गयी थी।

इंदिरा गाँधी के जीवन काल में ही मेनका ने अपना एक संगठन भी बना लिया था जिसको संजय विचार मंच नाम दिया गया था। उन्होंने वसीयत में यह भी दर्ज करवाया कि जितनी संपत्ति हमारे पास 1947 में थी अब उससे कम है। हालाकि उन्होंने इलाहाबाद में उनका आनंद हॉल जवाहरलाल नेहरु स्मारक ट्रस्ट को दान कर दिया था। वसीयत में लिखा गया कि महरौली वाला फार्म हाउस राहुल और प्रियंका को मिले। वसीयत में हिस्सेदारी दोनों बच्चों की बराबर की होगी। इंदिरा ने अपनी पुस्तकों के अधिकार (कॉपीराइट्स) भी तीनो बच्चो राहुल, प्रियंका और वरुण में बाँट दिए थे। वसीयत से उनके सारे जेवर प्रियंका को मिलेंगे और बाकी सब कुछ (शेयर, सिक्योरिटी व इत्यादि) तीनो बच्चो में बाँट दिए थे। पुरातन सामग्री प्रियंका को मिलेगी और निजी पेपर्स राहुल को मिलेंगे। बहुमूल्य पुस्तके और अन्य सामग्री राहुल और प्रियंका को मिलेगी जिनमे अन्य चीजों का भी जिक्र था।

इंदिरा गाँधी ने आगे लिखा कि तीनो बच्चो के नाम की गयी संपत्ति ट्रस्ट में रहेगी क्योकि बच्चे अभी नाबालिग है। और उस ट्रस्ट के प्रबंधक राजीव होंगे और किसी कारणवश राजीव को कुछ होता है तो फिर उसकी प्रबंधक सोनिया होगी। इस वसीयत से यह माना जा रहा था कि इंदिरा ने अपना राजनितिक उत्तराधिकार राजीव और राहुल को चुना था। वैसे भी 1980 में अचानक संजय के देहांत के बाद मेनका घर छोड़कर चली गयी थी। बताया जाता है कि इंदिरा गाँधी के पास ऐसी कोई जमीन-जायदाद नहीं थी जिस पर कोई ऊँगली उठा सके। उनका यह बोलना भी महत्त्व रखता था कि 1947 के बाद उनकी संपत्ति घटी थी जबकि उनका परिवार सालो तक सत्ता में रहा पर फिर भी विपक्ष ने उनके खिलाफ अतिरिक्त सम्पति का कोई मामला नहीं उठाया।

पिता जवाहर लाल नेहरु के साथ इंदिरा गाँधी

हाँ कुछ लोगो को इंदिरा से यह शिकायत ज़रूर थी कि अपने प्रधानमंत्रीत्व काल में भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना सख्त उन्हें होना चाहिए था वह उतनी नहीं थी। हालाकि यहीं शिकायत जवाहरलाल नेहरु से भी कुछ लोगो को थी। आजकल के पक्ष और विपक्ष को देखकर 1981 के समय में नेहरु- गाँधी परिवार एक तरह से राजनीती के संत थे। इंदिरा गाँधी ने भी एक बार अपने पिता जी जवाहर लाल नेहरु को लेकर इस बात का जिक्र किया था कि मेरे पिता तो संत थे पर मैं तो एक पॉलिटिशियन हूँ।

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About अबुवहाब चौधरी
अबुवहाब चौधरी मुम्बई के रहवासी और इंडिया-पॉलिटिक्स में बतौर फ्रीलांसर कार्यरत है। ये एक समाचार एवं फिल्म लेखक है। वहाब पत्रकारिता में किसी किस्म का पक्षपात नहीं करते एवं ताज़ा खबरों की तलाश में रहते है। Email- abuwahabchaudhary@gmail.com

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