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अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही माया बनी क्वीन, लोकसभा के लिए बसपा की रणनीति पर टिकी सब की निगाहें

Published on November 22 2018 02:02 pm  |  Author: हितेश कुमार

2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दल कमर कस कर तैयार है। चुनाव में लोगों को किस प्रकार अपने पक्ष में किया जाए, इस पर लगातार मंथन किया जा रहा है। एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में महागठबंधन बनाने की कवायद चल रही है तो दूसरी तरफ सभी राजनीतिक दलों के अलावा देश की जनता की नजर भी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर टिकी है।

कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के रणनीति ही केंद्र में सत्ता का भागीदार बनाएगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पाटी (बसपा) सुप्रीमो मायावती की रणनीति के खुलासा का इंतजार किया जा रहा है। कहा यह भी जा रहा है कि यदि बसपा महागठबंधन में शामिल होती है तो मोदी सरकार के लिए केंद्र का सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन के बराबर होगा। लेकिन इस महागठबंधन को अंतिम रूप देने की कवायद अभी से ही फेल होती नजर आ रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठजोड़ के मामले पर मायावती ने स्पष्ट कहा था कि कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव में जाना चाहती थी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी इस गठबंधन के पक्ष में थीं। लेकिन कांग्रेस के कुछ धूर्त नेताओं की वजह से गठबंधन को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। 

फिर मायावती ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी अपना कांग्रेस से गठजोड़ कर चुनाव मैदान में उतरी। वहीं मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस से किनारा करते हुए अन्य क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर चुनाव लड़ रही है। इस तरह से दोनों राज्यों में महागठबंधन के आकार नहीं लेने का लाभ भाजपा को मिल सकता है। भारतीय जनता पार्टी इन राज्यों में पिछले 15 वर्षों से लगातार शासन कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो यदि उत्तर प्रदेश में किंग मेकर और क्वीन की भूमिका में नजर आ रही बहन मायावती के लिए यह आखरी मौका होगा। अस्तित्व की लड़ाई से जूझ रही मायावती का लोकसभा चुनाव 2019 काफी अहम होगा। राजनीतिक विश्लेषक यह भी बताते हैं कि साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती को करारी शिकस्त मिली थी। इसके पश्चात 2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती की पार्टी बसपा राज्य में अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी। कुछ इसी तरह की परिदृश्य 2017 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला और मायावती की पार्टी पूरी लड़ाई से बाहर नजर आई।

इन परिस्थितियों को आंकते हुए विश्लेषक बताते हैं कि मायावती के पास विकल्प ज्यादा नहीं बचा है। सीमित विकल्पों में मायावती को सही रास्ता का चयन करना ही होगा। साथ ही साथ, महागठबंधन में शामिल नहीं होने की स्थिति में जनता के बीच यह संदेश भी जा सकता है कि मायावती ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन किया है। जिसके बाद मायावती के मुस्लिम वोटरों के खिसकने के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति और ज्यादा कमजोर हो सकती है।

यह भी कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव मायावती से गठजोड़ के लिए हर शर्त को मानने को तैयार हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने यहां तक कहा है कि बसपा से गठजोड़ की स्थिति में उनकी सीटें यदि कम हुई तो भी वे पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने के बाद मायावती के कांग्रेस नेताओं पर किया गया कटाक्ष के बाद मायावती राजनीतिक रणनीति के विषय में खुलासा करने से बच रही है। अपनी रणनीति का इशारा देने से परहेज कर रहीं बहन कुमारी मायावती के विषय में यह भी कहा जा रहा है कि बंद मुट्ठी लाख की और खुल गई तो खाक की! मतलब मायावती के रणनीतिक खुलासे के पूर्व उनकी राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ती जा रही है। देखने वाली बात यह होगी कि क्या बहन मायावती महागठबंधन में शामिल होती है, या कोई अन्य विकल्प के तहत तीसरा मोर्चा की कवायद फिर से रंग लाएगी?

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About हितेश कुमार
हितेश कुमार इंडिया-पॉलिटिक्स में बतौर फ्रीलांसर कार्यरत है। ये पौथु (बिहार) के रहने वाले है। हितेश पत्रकारिता में अभिरुचि होने के कारण विभिन्न विषयों पर अपने विचार लिखने की काबिलियत रखते है। इन्होने पत्रकारिता के क्षेत्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त कर, विभिन्न मीडिया हाउस में कार्य किया है। Email- hiteshkumarminku@gmail.com

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