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नोटबंदी से परेशान किसान, नहीं मिलता नगद पैसा हाथ में : मध्यप्रदेश

Published on November 19 2018 03:34 pm  |  Author: अबुवहाब चौधरी

मध्यप्रदेश के एक किसान रामसिंह चौधरी कहना है कि जब कोई किसान 30-40 किवंटल फसल लेकर मंडी में जाता है तो वह केवल अपनी फसल को बेचने नहीं आता है। वह खाद, बीज, कीटनाशक दवाई, कपडा, खल व घर ग्रहस्थी का सामान लेने भी आता है। अब हाथ में 10 हजार रुपए मिले तो वह अपने ट्रेक्टर में 50-55 लीटर डीजल भराए या फिर अन्य सामान खरीदे। हमारे मध्य प्रदेश में क्या हमारे पूरे देश में किसानो को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिलता है, जो एक चिंता का विषय है। हालांकि किसानो के लिए सही दाम का न मिलना ही समस्या नहीं है, बल्कि नोटबंदी के बाद से किसानो को नगद भुगतान भी नहीं किया जाता है। किसान कैलाश पटेल का कहना है कि "मैंने अपनी 135 किवंटल उपज फसल में से 36.10 किवंटल सोयाबीन देवास जिले की मंडी में 3,237 रुपए प्रति किवंटल के भाव से बेची।" उन्हें अपनी फसल की यह कीमत उनके गाँव से 29 किलोमीटर दूर आकर कन्नौद की थोक मंडी में मिली। जिसकी कुल कीमत 1,16,856 रूपये होती है। जिसमे से उन्हें केवल 10 हजार रूपये नगद मिले बाकी रुपयों के लिए उनसे कहा गया की उनके बैंक खाते में जायेंगे। पटेल ने बताया कि यह रकम सबसे अधिक है जो व्यापारी किसानो को नगद में दे रहे है। उन्होंने कहा मुझे इससे कोई ऐतराज़ नहीं है पर ये रकम बैंक मे आने में 7 से 8 दिन का समय लेती है।

कैलाश ने बताया कि अगर व्यापारी चाहे तो बाकी की रकम बैंक में NEFT (नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फण्ड ट्रान्सफर) के जरिये एक दिन में ट्रान्सफर कर सकता है लेकिन वे बहाने बनाते है की सिस्टम में खराबी चल रही है। पटेल ने दावा किया कि “पहले ऐसा कुछ भी नहीं होता था, ये सब नोटबंदी के कारण हुआ है”। उन्होंने आगे कहा कि पहले किसानो को नगद भुगतान किया जाता था बल्कि हमे भुगतान के लिए फोन भी नहीं करना पड़ता था। अब तो हमारे गाँव के पास की ब्रांच में से पैसा निकालने के लिए घंटो लाइन में खड़ा होना पड़ता है तथा 50,000 से अधिक की रकम निकालने पर पेन कार्ड अलग से दिखाना होता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह सब नोटबंदी की वजह से हुआ है, उन्हें यानि भाजपा को सबक सिखाना चाहिए।

कैलाश की बात से सहमत होकर रामसिंह कहते है कि अब अगर हाथ में 10 हजार रुपए मिले तो वह अपने ट्रेक्टर में 50-55 लीटर डीजल भराए या फिर अन्य सामान खरीदे। उन्होंने कहा कि डीजल भरवाने के बाद थोड़े पैसे बचते है जो अन्य सामान खरीदने के लिए पर्याप्त रकम नहीं होती है। इसलिए किसान अपनी ट्राली लेकर फिर खाली हाथ जाता है। उनका कहना है कि बहुत से किसानो के पास इतनी रकम नहीं होती कि वे दोबारा ट्रेक्टर ट्राली किराये पर लाये। आपको बता दे रामसिंह चौधरी के पास 100 बीघा जमीन है जो उज्जैन जिले के घटिया तहसील के विनायगा गाँव के रहने वाले है।

वहीं एक और किसान जयदीप सिंह सोलंकी जो देवास के बागली तहसील के जटाशंकर गाँव के रहने वाले है उनका कहना है कि "भुगतान के लिए 5-6 दिन अब आम बात हो गयी है। पहले ऐसा नहीं होता था पहले किसानो को नगद पैसा दिया जाता था। अब व्यापारी किसानो को चैक देते है जिसके क्लियर होने में ही 15 दिन लग जाते है। तथा ये किल्लत जून-जुलाई व नवम्बर-दिसम्बर में ज्यादा होती है क्योकि हमे तब ही मजदूरों को भुगतान करना, और अन्य सामान खरीदना होता है। सरकार में बैठे लोग किसानो की समस्या का न निवारण करते है न ही उन्हें किसानो की समम्स्या दिखती है।"

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Tags: #madhya pradesh    #demonetization    #bjp    #farmer   

About अबुवहाब चौधरी
अबुवहाब चौधरी मुम्बई के रहवासी और इंडिया-पॉलिटिक्स में बतौर फ्रीलांसर कार्यरत है। ये एक समाचार एवं फिल्म लेखक है। वहाब पत्रकारिता में किसी किस्म का पक्षपात नहीं करते एवं ताज़ा खबरों की तलाश में रहते है। Email- abuwahabchaudhary@gmail.com

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