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ऐसे भारी पड़ती है किसानों के कर्ज माफ़ी की घोषणा

Published on November 20 2018 07:26 pm  |  Author: अंकुर मिश्रा

चुनाव आते ही जो सबसे आम वादा राजनैतिक पार्टियाँ करती है वो है किसानों क कर्ज माफ़ी को और इस वादे को सबसे सफल वादे के रूप में भी देखा जाता है। 1990 में पहली बार वीपी सिंह ने कर्ज माफ़ी की घोषणा की थी, जिसके बाद सियासत की जबान पर इसका ऐसा स्वाद लगा की आज भी चुनावों में किसानों को लुभाने का सबसे कारगर तरीका इसी को कहा जाता है।

माना जाता है की भाजपा की उत्तर प्रदेश में इतनी बड़ी जीत की वजह यही थी। इस लिए कांग्रेस ने भी इसका स्वाद चखने के लिए दो दिन पहले छत्तीसगढ़ में किसानो के कर्ज माफ़ी को लेकर कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है दस दिन के अंदर ही कर्ज माफ़ कर दिए जायेंगे। पर बता दें ऐसी घोषणा देश की अर्थ व्यवस्था पर नकारात्मक असर डालता है। इसी को ध्यान रखते हुए एक बैंक कर्मचारी संगठन ने चुनाव आयोग से राजनीतिक दलों को इस तरह की घोषणा करने से रोकने की मांग की है।

इंडियन काउन्सिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनोमिक रिलेशन एक रिसर्च के अनुसार “वीपी सिंह के द्वारा कर्जमाफी की घोषणा करने के बाद बैंकों के द्वारा कर्जवसूली क्षमता में भारी कमी आई थी। अकेले कर्नाटक राज्य में ही बैंकों के द्वारा कर्ज वसूलने की क्षमता कुल कर्ज के 74.9 फीसदी से घटकर 41.1 फीसदी रह गई थी।

2017 के सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार ने 36,000 करोड़ का कर्ज माफ किया था जिसके बाद राज्य राज्य में  भारी वित्तीय संकट सामने आ गये थे, यहाँ तक कि कर्मचारियों को वेतन देने में भी सरकार को दिक्कत झेलनी पड़ी। हालाँकि की कुछ लोगों का कहना है कि किसानों का कर्ज माफ़ सरकार और बैंक के लिए इतनी बड़ी बात नहीं होती है। कारण बताते हुए कहा गया कि “रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने 31 दिसंबर 2017 को एक आंकड़ा जारी किया था, जिसके मुताबिक बैंकों को एनपीए के रूप में होने वाले कुल नुकसान का 20.4 फीसदी हिस्सा उद्योगों के जरिये हुआ था। जबकि किसानों का हिस्सा महज 6.53 फीसदी ही था। इसलिए चंद उद्योगपतियों के जरिये होने वाले बड़े नुक्सान को करोड़ों किसानों के नुकसान को एक श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।

बैंक कर्मचारी संगठन ने की रोकने की मांग   

मंगलवार को नेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष अश्वनी राणा ने चुनाव आयोग को एक पत्र लिखा जिसमे उन्होंने मांग की है कि वह राजनीतिक दलों को कर्जमाफी की घोषणायें करने से रोकने का निर्देश जारी करे। उन्होंने ने बताया कि बैंकों की की हालत बहुत ख़राब चल रही है। नेताओं के कर्ज माफ़ी के वादे के बाद जो किसान कर्ज देने में सक्षम होते हैं वो भी नही दते जिसे बैंक का भार बढ़ता है। उनका कहना है कि राजनीतिक दलों को इस तरह की घोषणाओं को करने से रोकना ही देशहित में होगा।

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About अंकुर मिश्रा
अंकुर मिश्रा दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिंदी में ग्रेजुएट है। अपनी पढाई के दौरान अंकुर विश्वविद्यालय की राजनीती में रहे है और वे भारतीय राजनीति में बेहद दिलचस्पी रखते है। इंडिया पॉलिटिक्स में अंकुर इनपुट डेस्क पर राइटर एवं रिपोर्टर का कार्य कर चुके है। अंकुर को पत्रकारिता के साथ-साथ कवि सम्मलेन एवं कविता पाठ का भी अनुभव है। Email- ankurlive01@gmail.com

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