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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव : हिंदुत्ववादी राजनीति में विकास के मुद्दे भूल चुके है भाजपा और कांग्रेस

Published on November 01 2018 01:45 pm  |  Author: अबुवहाब चौधरी

भुखमरी, कुपोषण, विस्थापन, किसान खेती और आदिवासी अधिकार व अन्य मुद्दों को छोड़कर दोनों ही दिग्गज पार्टियां कांग्रेस व बीजेपी ने मध्यप्रदेश में हिंदुत्व की राजनीति को चरम सीमा पर रखा है। मध्यप्रदेश में धर्म की राजनीति इतनी गरम हो चुकी है कि दोनों ही पार्टिया अब हिन्दुत्ववादी विचारधारा के ऊपर चुनाव लड़ रही है। इस चुनावी माहौल को देखते हुए साधू-संत भी अपना फायेदा तलाशते नज़र आ रहे है।

बीते 22 अक्टूबर को भोपाल में एक सभा आयोजित की गयी जिसमे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्य अतिथि थे। इस सभा से बीजेपी और शिवराज जनता में यह सन्देश देना चाहते थे, कि कंप्यूटर बाबा ने मंत्रिपद से भले ही इस्तीफा दे दिया हो लेकिन संत-समाज अभी भी भाजपा और शिवराज के साथ है। लेकिन ऐसा नहीं कि हर संत खुश था, उनमे एक संत ऐसा भी था जिसने शिवराज पर ताना मारते हुए कहा, कि "आपको संत हमेशा 5 साल बाद ही याद आते है।" तब उस कार्यक्रम के आयोजनकर्ता ने कहा, कि "यह राजनीती का मंच नहीं है, इसे राजाभोज एकता कल्याण समिति ने कराया है। और शिवराज यहाँ सिर्फ एक मुख्य अतिथि है व संत समाज ने इन्हें आशीर्वाद देने के लिए यहाँ बुलाया है।" आयोजन में कुछ बाबाओ ने कंप्यूटर बाबा पर हमला करते हुए कहा कि क्या हुआ कंप्यूटर बाबा नाराज़ है तो एक खाली कंप्यूटर से कुछ नहीं होता बाकी 99 तो यहीं है। और अब कंप्यूटर का नही लैपटॉप का जमाना है इस बात शिवराज भी जमकर हंसे।

हालाकि कोई शिवराज को हिंदुत्व को बढ़ावा देने वाला मुख्यमंत्री कहता है तो कोई संघ का प्रचारक क्योकि लगता भी है जैसे- गौ मंत्रालय बनाने की घोषणा, स्कूलों की किताबो में भगवद गीता का पाठ, नर्मदा सेवा यात्रा, एकात्म यात्रा व् इत्यादि कार्य उन्होंने ऐसे किये है। जिससे उनकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा का साफ़ पता चलता है। मुख्यमंत्री जी ने सभा में करीब 3 घंटे बिताये जिससे साफ़ पता चलता है कि संत समाज उनके लिए कितना महत्व रखता है वहीं पिछले डेढ़ - दो सालो में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपने भाषणों में संत समाज के लिए नीतिया, घोषणा व तारीफ़ करते नज़र आये है जिससे दृष्टि और साफ़ हो जाती है कि दोनों पार्टिया हिदुत्व के ऊपर चुनावी मैदान जितना चाहती है।

अगर देखा जाये तो प्रदेश में हिदुत्व की चुनावी बिसात मध्यप्रदेश में दिसम्बर 2016 में हुई जब शिवराज ने नर्मदा सेवा यात्रा का आयोजन किया, जो 15 मई 2017 को समाप्त हुई। इसके जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय से ने भी 30 सितम्बर 2017 से नर्मदा परिक्रमा पद यात्रा निकाली जो 9 अप्रैल 2018 को समाप्त हुई। हालाकि दिग्विजय सिंह ने इसे राजनीति से अलग बताया लेकिन कांग्रेस ने इसके ऊपर बहुत से चुनावी फायदे उठाये। कांग्रेस समर्थको ने इस बात पर भी चुटकी लेते हुए कहा कि दिग्विजय की यात्रा साधारण धार्मिक यात्रा थी। वहीं शिवराज की यात्रा में सरकारी धन को लुटाया गया। हालाकि जब शिवराज ने यह देखा कि दिग्विजय पद यात्रा पर निकल चुके है तो उन्होंने भी फिर एकात्म यात्रा का आयोजन किया। शिवराज ने जिस वक़्त देखा कि संत समाज नाराज़ है उन्होंने कुछ संतो को मंत्री पद का दर्जा तक दे दिया जिसमे से कंप्यूटर बाबा ने इस्तीफा देकर बगावत कर दी।

चुनाव जितना नजदीक आते जा रहे उतना ही दोनों पार्टिया हिंदुत्व को बढ़ावा दे रही है। दोनों ही पार्टियों के नेता मंदिर में माथा टेकने जाते है और वहां नयी-नयी घोषणा करते है। शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा वहीं दिग्विजय की समन्वय यात्रा व राहुल गाँधी की मानसरोवर यात्रा से पता चलता है कि दोनों पार्टिया कितना जतन कर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता कहते है कि उनके घोषणा पत्र में गौशाला और राम गामा पथ की बात है। दोनों ही पार्टिया चुनावी मैदान में अपने साथ संतो का साथ दिखा रही है।

अगर पिछले तीन चुनाव देखे जाये तो वह बिजली, पानी, विकास, किसान को फायेदा और भुखमरी के ऊपर लड़े गए थे पर अबकी बार मामला उल्टा है, अबकी बार चुनाव धर्म और हिदुत्व के ऊपर लड़ा जा रहा है। प्रदेश में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ रहे आदिवासी युवा शक्ति के संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा कहते है कि "दोनों पार्टिया मूल मुद्दों जैसे - भुखमरी, कुपोषण, विकास, बिजली, स्कूलों के रख रखरखाव, कॉलेज का प्रबंधन इन सब को भूलकर धर्म की राजनीती कर रही है। उन्होंने कहा, कि प्रदेश का किसान परेशान है आत्महत्या कर रहा है। मजदूर पेट नहीं भर रहा है और 78000 अतिथि शिक्षको को अचानक हटा दिया गया उस पर कोई बात नहीं कर रहा है।" वहीं सामाजिक कार्यकर्त्ता प्रशांत दुबे कहते है कि "शिक्षा, स्वस्थ जीवन व बच्चो से कुपोषण को ख़त्म करने की बात कोई भी दल नहीं कर रहा है।"

बीजेपी को उम्मीद है कि आस्था के चक्कर में लोग उन्हें फिर वोट देंगे वहीं कांग्रेस भी आस्था के चक्कर में ही असल मुद्दे भूल चुकी है। राजनीती के विश्लेषक कहते है कि दोनों ही पार्टिया अब राम मंदिर और संत समाज की देखभाल में लगे हुए है। आगे कहते है कि चलो हम मान लेते है बीजेपी की तो कवायद ही हिदुत्व की है लेकिन कांग्रेस ने इसमें कूदकर अपने आप को और छोटा कर दिया है।

कांग्रेस प्रवक्ता कहते है कि हम तो राम को बर्षो से मानते है गाँधी जी ने ही राम मंदिर का ताला खुलवाया था। नहीं तो बीजेपी तो राम को भी टाट पर टांग देती। बहरहाल बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ने यह सीख अपने गुरुओ से ले ली है कि जहाँ भी चुनावी रैली करेंगे वहां रैली बाद में पहले मंदिर के दर्शन करेंगे। अब देखना यह है कि क्या दोनों ही पार्टिया संत समाज को खुश करेंगी या फिर मुद्दों की बात भी करेगी।

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About अबुवहाब चौधरी
अबुवहाब चौधरी मुम्बई के रहवासी और इंडिया-पॉलिटिक्स में बतौर फ्रीलांसर कार्यरत है। ये एक समाचार एवं फिल्म लेखक है। वहाब पत्रकारिता में किसी किस्म का पक्षपात नहीं करते एवं ताज़ा खबरों की तलाश में रहते है। Email- abuwahabchaudhary@gmail.com

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